Ram Lalla Murti अद्भुत है रामलला का स्वरूप, जानें राम जी की मूर्ति से जुड़े यह रहस्य

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नमस्ते दोस्तों और राम भक्तों! स्वागत करते हैं आपका हमारे ब्लॉग पर आज हम बात करेंगे भगवान श्री रामलला के मूर्ति बारे में।

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Ram Lalla

भारतीय संस्कृति में राम भगवान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके भक्तों के लिए, सपना था कि भगवान श्री राम के लिए एक आदर्श मंदिर का निर्माण हो। और यह सपना अब पूरा हो गया है।

राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत 1989 में हुई थी, जब भूमि पूजन के लिए भूमि खरीदी गई लेकिन इसके बाद लंबे समय तक मुद्दों के कारण निर्माण कार्य रुका रहा सारे मुद्दों के बावजूद, भक्तों का विश्वास अटूट रहा। और अंततः, 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया - राम मंदिर के निर्माण की अनुमति दी गई।

 

अयोध्या में बन रहे राम मंदिर की एक झलक पाने के लिए हर कोई उत्सुक है। हर किसी को इंतजार है कि कब राम मंदिर में दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। राम भक्तo me 22 जनवरी को लेकर एक अलग ही उत्साह देखने को मिल रहा है। जगह-जगह रामायण पाठ किया जा रहा है। इस बीच गर्भगृह में स्थापित हो चुके भगवान श्री राम की प्रतिमा की पहली तस्वीर सामने आ गई है. रामलला की प्रतिमा में माथे पर तिलक नजर आ रहा है. साथ ही चेहरे पर मधुर मुस्कान है भगवान राम ji की ये मूर्ति इतनी खूबसूरत बनाई गई है कि इसमें भगवान के चेहरे पर गजब का तेज नजर आ रहा है साथ ही बच्चे जैसी मासूमियत भी। इस मूर्ति की ऊंचाई करीब 51 इंच और वजन 150 किलोग्राम है


गर्भगृह में विराजमान रामलला के यह प्रतिमा बेहद सुंदर है और भावुक कर देने वाला है। इस प्रतिमा को ध्यान से देखे तो यह प्रतिमा काले पत्थर से बनाया गया है। और इस परितमा में रामलला की आयु 5 वर्ष बताई गई है और उनके चारों और कुछ प्रतीक बनाए गए है जिनसे इस प्रतिमा को ऊर्जा प्राप्त होगी।

आम तौर पर जो प्रकट प्रतिमा होते है वो कुछ ख़ास चिह्न और निशानी लेकर प्रकट होते है जो की उनकी शक्ति को बढ़ा देते है। मूर्तिकार ने इसी बात का विशेष ध्यान रखा है।

 अगर ध्यान से देखें तो कहीं से भी पत्थर को तोड़ा नहीं गया है श्री राम लला विराजमान के मस्तक के ठीक ऊपर भगवान सूर्य नारायण का प्रतीक है। सूर्य जगत की आत्मा है और श्री राम सूर्यवंशी है इसलिए उनके मस्तक के ऊपर आशीर्वाद के रूप में सूर्य नारायण को रखा गया है। मूर्ति के दाएं ओर ॐ और स्वस्तिक का चिह्न है। शिवपुराण विद्येश्वर संहिता के अनुसार शिव के पांच मुख है और ॐ उनके मुख से निकली पहली ध्वनि है। शब्द सिद्धि के लिए ॐ बेहद ज़रूरी है इसलिए मूर्तिकार ने ॐ के प्रतीक को बनाया। इसके बाद स्वास्तिक को भी जगह दी जिसके बिना कोई शुभ कार्य नहीं हो सकता। स्वास्तिक को हिन्दू धर्म में गणेश जी का प्रतीक माना गया है इसलिए विघ्नहर्ता के रूप में स्वास्तिक विराजमान हुआ है।

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इसके बाद प्रतिमा के बायीं ओर देखे तो चक्र और गदा है। इसका सीधा सम्बन्ध विष्णु भगवान से है। दरअसल विष्णु को देवताओं का नायक कहा गया है और देवासुर संग्राम में विष्णु ही देवताओं की मदद करते है। श्री राम उन्हीं विष्णु के अवतार हैं और वो चक्र गदा को धारण करते हैं। इसलिए आसुरी शक्तियों का नाश करने के लिए इस प्रतिमा को चक्र गदा से दर्शाया गया है।

 

श्री विष्णु के 10 अवतार

 

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अगर और ध्यान से देखे तो दाएं और बाएं दोनों ओर श्री विष्णु के 10 अवतारों के प्रतीकों को उभार गया है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि अवतार को दोनों ओर जगह दी गई है।


दायीं ओर वामन अवतार के नीचे हनुमान जी विराजमान है जो शिव के रूद्र रूप है और त्रेता में उन्होंने श्री राम की सेवा के लिए रुद्रावतार लिया था। इसलिए मूर्तिकार ने हनुमान जी को श्री राम के चरणों के पास स्थान दिया है।  श्री राम के चरण के पास ही कमल है जो श्री यानी लक्ष्मी का प्रतीक है ,श्री विष्णु कभी भी अपनी शक्ति के बिना कोई कार्य नहीं करते इसलिए कमल को शक्ति रूप में विराजित किया गया है।

 

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 बाईं ओर कल्कि अवतार के प्रतीक के नीचे गरुड़ को विराजित किया है। महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप और विनता के पुत्र गरुड़ को श्री विष्णु ने अपना वाहन बनाया था इसलिए मूर्तिकार ने इस बात का भी विशेष ख्याल किया और गरुड़  को श्री राम के चरण के पास स्थान दिया है। इससे श्री विष्णु की ऊर्जा इस प्रतिमा को प्राप्त होती रहेगी।

 

अयोध्या राम मंदिर की मूर्ति श्याम रंग की है।इसे लेकर कई लोगों के मन में ये सवाल उठ रहा होगा कि आखिर क्यों राम मंदिर में श्याम वर्ण की मूर्ति लगाई जा रही है।

बता दें रामायण में भी कहा गया है कि प्रभु श्रीराम श्याम वर्ण के थे और इसलिए इस रंग की मूर्ति को ज्यादा महत्व दिया गया है। भगवान श्रीराम की स्तुति मंत्र में भी एक श्लोक है: 

'नीलाम्बुज श्यामल कोमलांगम सीतासमारोपित वामभागम्। पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।'

 

जिसक मतलब है कि नीलकमल के समान श्याम और कोमल जिनके अंग हैं, सीता जी जिनके वाम भाग में विराजमान हैं, जिनके हाथों में अमोघ बाण और सुंदर धनुष है, उन रघुवंश के स्वामी श्रीरामचंद्र जी को मैं नमस्कार करता हूं। अर्थात् श्रीराम जी श्याम वर्ण के हैं।


अब आप लोग ये सोच रहे होगे इतनी दुर्लभ मूर्ति को बनाने का सौभाग्य किसे मिला हे?

 रामलला की मूर्ति कर्नाटक के प्रसिद्ध मूर्तिकार अरुण योगीराज ने बनाई है अरुण योगीराज प्रसिद्ध मूर्तिकार योगीराज शिल्पी के बेटे हैं। अरुण मैसूर महल के कलाकारों के परिवार से आते हैं

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यहाँ पे लोगों के मन में एक और सवाल है कि राम की नई प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के बाद पुरानी प्रतिमा का क्या होगा? ‘रामलला’ की मूर्ति, जो मंदिर बनने से पहले टेंट में रखी थी, उसे भी इसी नए बने मंदिर में रखा जाएगा. 19 जनवरी की शाम की आरती के बाद नए मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति को स्थापित कर दिया गया. आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के मुख्य पुजारी ने बताया कि पुरानी मूर्ति की पूजा कई साल से होती आई है. अब इसकी पूजा नई मूर्ति के साथ होगी.

बता दें कि  23 जनवरी से मंदिर सभी लोगों के दर्शन करने के लिए खोल दिया जाएगा। अब हमें उम्मीद है कि आपको यह ब्लॉग पसंद आयी होगी। ऐसे ही रोचक जानकारी के लिए बने रहिए हमारे साथ।

धन्यवाद, जय श्री राम!

 

 

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